Wednesday, 7 April 2021

श्रीमदभागवत कथा से होता है मानव को कर्तव्यबोध पंडित राम बहाल शास्त्री

 माता प्रसाद पाण्डेय संवाददाता भारत भारी


नगर पंचायत भारत भारी मोतीगंज चौराहे पर चल रहे नव दिवसीय श्रीमद भागवत पुराण कथा ज्ञानयज्ञ में मंगलवार शाम को अवध धाम से पधारे कथावाचक पंडित रामबहाल शास्त्री ने श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए। सभी श्रोताओं को बताया कि अंतकाल में हम जिस जीव का स्मरण करते हुए शरीर का परित्याग करते हैं पुनः दूसरे जन्म मैं उसी शरीर को प्राप्त होते हैं। पंचम स्कंध में जब भरत के कथानक को सुनाते हुए बताया कि जब भरत एक तपस्वी थे पूरा जीवन उन्होंने तपस्या में व्यतीत किया अन्त के समय में एक हिरन के बालक मैं मन लग जाने से मरते समय हिरन के बच्चे का स्मरण करने से हिरन शरीर को दूसरे जन्म में प्राप्त किया। आगे कथा के क्रम में शास्त्री जी ने बताया कि मानव जीवन का एक ही लक्ष्य है। भगवान के नाम का स्मरण करना महाराज ने कहा कि संस्कारों में नामकरण संस्कार का विशेष महत्व होता है। वह पापी को पावन बना देता है। दुष्कर्मी अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा था। उसी नाम को लेने से उसका उद्धार हो गया। शास्त्री जी ने कहा कि समुद्र मंथन से तो एक बार में केवल चौदह रत्न मिले थे पर आत्ममंथन से तो मनुष्य को परमात्मा की प्राप्ति होती है। जो हरि का दास है वह सुख दुख से परे होकर हमेशा परमानंद की स्थिति में रहता है। उन्होंने प्रहलाद और मीरा का उदाहरण देते हुए भक्त की महानता का वर्णन किया। कहा कि हिरण्यकश्यप अपने भाई की मौत का बदला भगवान विष्णु से लेने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या करने के लिए एक वट के नीचे बैठ गया। जहां देव गुरु वृहस्पति तोता का रूप धारण कर वृक्ष पर बैठ गए। और नारायण नाम का रट लगाने लगा। आजिज हिरण्यकश्यप तपस्या छोड़ कर घर आ गया। पत्‍‌नी ने पूछा कि आप तपस्या छोड़कर क्यों चले आए तो तोता की बात बताई। पत्‍‌नी ने भी भगवान के नाम क जप किया और गर्भ ठहर गया और भक्त प्रहलाद के रूप में बालक का जन्म हुआ। जब प्रहलाद गुरुकुल से घर आए तो हिरण्यकश्यप ने पूछा कि क्या शिक्षा ग्रहण किए हो। प्रहलाद भगवान का गुणगान करने लगे। इससे हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा और कहा कि तुम मेरे शत्रु का गुणगान कर रहे हो। लेकिन प्रहलाद ने भगवान की अराधना नहीं छोड़ी। हिरण्याकश्यप अत्याचार करता रहा और भगवान प्रहलाद को बचाते रहे। एक दिन हिरण्यकश्यपु ने प्रहलाद से कहा कि तुम्हारे भगवान कहां हैं। प्रहलाद ने जवाब दिया कि कण-कण में हैं और इस खंभे में भी हैं। इतना सुनते ही हिरण्यकश्यपु ने तलवार निकाल कर खंभे पर वार कर दिया। तब नरसिंह के रूप में भगवान प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का वध कर देते है। यजमान राधेश्याम अग्रहरि सुशीला अग्रहरि सावित्री अग्रहरि विनय अग्रहरि खजांची अग्रहरि ईश्वरचन्द्र अग्रहरि राजकुमार अग्रहरि धनंजय चौरसिया राघव राम पांडे रामसहाय पांडे रामेंद्र सोनी राधेश्याम गुप्ता रामसागर कसौधन बजरंगी प्रतिमा अग्रहरि नीलम अग्रहरी बिंदु अग्रहरि शकुंतला अग्रहरि भगवान प्रसाद अग्रहरि पिंटू रानी पुष्पा प्रियल आदि श्रद्धालुओं ने कथा का रसपान किया।

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